आर्टिस्ट सौरभ प्रामाणिक को क्यों कहा जाता है Aurorealist ?
आर्टिस्ट सौरभ प्रामाणिक को क्यों कहा जाता है Aurorealist ?
कला विशेष: झारखंड की समृद्ध माटी, यहाँ की परंपराओं और लोक-उत्सवों का सार अब कैनवास पर एक अनोखे और अमूर्त (Abstract) रूप में जीवंत हो रहा है। युवा चित्रकार सौरभ प्रामाणिक अपनी अनूठी कला शैली 'ऑरोरियलिज्म' (Aurorealism) के माध्यम से राज्य की सांस्कृतिक जड़ों को वैश्विक धरातल पर प्रस्तुत कर रहे हैं। किसी स्थापित कलाकार या शैली का अनुकरण करने के बजाय, वे सीधे प्रकृति और लोक-संस्कृति से प्रेरणा लेकर कला जगत में अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं।
1. 'Aurorealism' शब्द का अर्थ और दर्शन
'ऑरोरियलिज्म' दो शब्दों के मेल से बना है जो इसके वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करता है:
- 'Auro' (ऑरो): यह लैटिन शब्द Aurora (दिव्य प्रकाश/सुबह की किरण) और Aura (आभा या सूक्ष्म ऊर्जा मंडल) से आया है। इसका तात्पर्य उस अदृश्य, स्पंदित ऊर्जा और चेतना से है जो हर वस्तु के भीतर विद्यमान रहती है।
- 'Realism' (रियलिज्म): इसका अर्थ है 'यथार्थवाद' या वास्तविक सत्य।
जहां पारंपरिक रियलिज्म केवल बाहरी दुनिया (पेड़, चेहरे या वस्तुओं) की सीधी नकल करता है, वहीं ऑरोरियलिज्म (आभा-यथार्थवाद) का मानना है कि असली यथार्थ केवल बाहरी भौतिक ढांचा नहीं, बल्कि उसके भीतर बहने वाली रोशनी, आस्था और सांस्कृतिक ऊर्जा है। सौरभ प्रमाणिक लोक-संस्कृति के बाहरी रूप को उकेरने के स्थान पर उसके भीतर छिपे 'आभा-रूपी सच' को ही असली यथार्थ मानकर कैनवास पर उतारते हैं।
2. दृश्य से परे 'सूक्ष्म सच' (Micro-Truth) की अनुभूति
सौरभ के लिए कला केवल कैनवास पर रंग भरना या किसी सुंदर दृश्य की नकल करना नहीं है। ऑरोरियलिज्म के ज़रिए वे उस 'माइक्रो-ट्रुथ' (छिपे हुए सूक्ष्म सच) को प्रस्तुत करते हैं जो सामान्य दृष्टि से ओझल रहता है। उनकी पेंटिंग्स दर्शक को केवल एक देखने वाला नहीं बनातीं, बल्कि उसे उस गहरे संवेदी और सांस्कृतिक अनुभव का सीधा हिस्सा बना देती हैं।
3. 'सेंट्रल पोर्टल' तकनीक और रोशनी का जादुई खे
ऑरोरियलिज्म में तकनीक और विचार का अद्भुत संगम देखने को मिलता है:
- सेंट्रल पोर्टल कंपोजिशन: सौरभ अपनी रचनाओं में इस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जिससे दर्शक की नज़र सीधे चित्र के केंद्र (हृदय) पर जाकर टिक जाती है।
- प्रकाश और छाया का स्पंदन: उनके चित्रों में रोशनी इस तरह संयोजित होती है मानो वह लगातार जलती-बुझती हुई स्पंदित हो रही हो। सौरभ का मानना है कि रोशनी कभी स्थिर नहीं रहती, और कला का काम उसी सूक्ष्म गति को महसूस कराना है।
4. लोक-प्रतीकों का अमूर्त और दार्शनिक रूपांतरण
वर्ष 2024 के बाद की उनकी कृतियों में दो प्रमुख आकृतियाँ उभरकर सामने आई हैं, जो झारखंड की लोक-परंपराओं के दार्शनिक प्रतीक हैं:
- स्तंभ (खंभा): टुसू के चौडल, चरक के पाट, मनसा पूजा के विसर्जित पाट और बंदना पर्व के खूंटे से प्रेरित यह आकृति जीवन में हिम्मत, विषम परिस्थितियों में सीधे खड़े रहने और ऊपर उठने की ऊर्जा का प्रतीक है।
- टीला: यह आकृति झारखंड की माटी, अपनी जड़ों की गर्माहट और जीवन में ठहराव को दर्शाती है।
निष्कर्ष
पारंपरिक लोक-आस्थाओं और माटी के गंध को आधुनिक अमूर्त कला की भाषा में ढालकर दुनिया के सामने रखने का यह अभिनव और विचारशील प्रयास ही सौरभ प्रामाणिक को कला जगत में एक सच्चा 'Aurorealist' (ऑरोरियलिस्ट) कलाकार बनाता है।


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